"सुनी-सुनाई बात कोई प्रमाण नहीं होती" – कथन का व्याख्या अपवादों सहित
यह सिद्धांत कि "सुनी-सुनाई बात (Hearsay) कोई प्रमाण नहीं होती" साक्ष्य कानून का एक मौलिक नियम है। यह कथन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि सुनी-सुनाई बातें सामान्यतः न्यायिक कार्यवाहियों में अस्वीकार्य होती हैं क्योंकि वे अविश्वसनीय होती हैं, उनकी सटीकता संदिग्ध होती है, और उनका प्रतिपरीक्षण (cross-examination) संभव नहीं होता। हालाँकि, अधिकांश विधिक नियमों की तरह, इस नियम के भी कुछ अपवाद होते हैं। इस चर्चा में, हम सुनी-सुनाई बातों का अर्थ, उन्हें अस्वीकार करने के पीछे का तर्क, और वे विभिन्न परिस्थितियाँ जिनमें इन्हें साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाता है, का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
1. सुनी-सुनाई बात (Hearsay) का अर्थ
सुनी-सुनाई बात (Hearsay Evidence) वह कथन होता है जिसे वह व्यक्ति नहीं कह रहा जिसने प्रत्यक्ष रूप से कोई घटना देखी या अनुभव की हो, बल्कि वह किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कही गई बात को अदालत में दोहरा रहा हो। सरल शब्दों में, यह दूसरे व्यक्ति से सुनी गई सूचना होती है, जिसे प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
सुनी-सुनाई बात का उदाहरण
मान लीजिए, एक गवाह अदालत में कहता है:
- "मैंने श्री X को यह कहते सुना कि श्री Y ने पीड़ित की हत्या की।"
यहाँ, गवाह ने खुद घटना नहीं देखी, बल्कि केवल किसी अन्य व्यक्ति (श्री X) से सुनी हुई बात को दोहरा रहा है। क्योंकि श्री X अदालत में मौजूद नहीं है और उसका प्रतिपरीक्षण नहीं किया जा सकता, इसलिए यह सुनी-सुनाई बात (Hearsay) मानी जाएगी और सामान्यतः अस्वीकार्य होगी।
विधिक परिभाषा
सुनी-सुनाई बात को आमतौर पर इस प्रकार परिभाषित किया जाता है:
"कोर्ट के बाहर किसी व्यक्ति द्वारा दिया गया बयान, जिसे अदालत में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाए, लेकिन जिसे प्रतिपरीक्षण के लिए उपस्थित नहीं किया जा सकता।"
2. सुनी-सुनाई बातें आमतौर पर अस्वीकार्य क्यों होती हैं?
न्यायिक प्रक्रिया में सुनी-सुनाई बातों को अस्वीकार करने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
(क) प्रतिपरीक्षण (Cross-Examination) का अभाव
एक निष्पक्ष मुकदमे की मूलभूत शर्त यह है कि प्रतिपक्ष को गवाह से जिरह (cross-examination) करने का अवसर मिले। लेकिन जब कोई बयान अदालत के बाहर दिया गया हो, तो उस बयान के मूल वक्ता (original speaker) से जिरह करना संभव नहीं होता।
(ख) गलत व्याख्या का खतरा
किसी भी सूचना के एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचने के दौरान, उसके बदल जाने, बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किए जाने, या गलत व्याख्या किए जाने की संभावना रहती है।
(ग) अविश्वसनीयता और सत्यापन का अभाव
कोर्ट के बाहर दिए गए बयान अक्सर बिना किसी प्रमाण के होते हैं और वे पूर्वाग्रह, गलती, या झूठ पर आधारित हो सकते हैं।
(घ) प्रत्यक्ष साक्ष्य को बढ़ावा देना
न्यायपालिका पक्षकारों को प्रत्यक्ष साक्ष्य (Eyewitness testimony, दस्तावेज़, या विशेषज्ञ राय) प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करती है, बजाय इसके कि वे दूसरे व्यक्ति से सुनी हुई बातों पर भरोसा करें।
3. सुनी-सुनाई बातों के अपवाद (Exceptions to Hearsay Rule)
हालाँकि सुनी-सुनाई बातों को सामान्यतः अस्वीकार किया जाता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में इन्हें न्यायालय स्वीकार कर सकता है। ये अपवाद इसलिए बनाए गए हैं क्योंकि कुछ मामलों में सुनी-सुनाई बातें विश्वसनीय और न्यायिक प्रक्रिया के लिए आवश्यक हो सकती हैं।
(i) मृत्युपूर्व कथन (Dying Declaration)
यदि कोई व्यक्ति मरने से पहले कोई बयान देता है, और वह बयान उसकी मृत्यु के कारण से संबंधित होता है, तो उसे प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
- उदाहरण: यदि कोई पीड़ित कहे, "मुझे श्री Z ने चाकू मारा," और फिर उसकी मृत्यु हो जाए, तो यह बयान अदालत में मान्य होगा।
(ii) अपने विरुद्ध दिया गया बयान (Statement Against Interest)
यदि कोई व्यक्ति अपने स्वयं के विरुद्ध कोई बयान देता है (जैसे कि अपराध स्वीकार करता है), तो वह बयान न्यायालय में स्वीकार्य हो सकता है।
- उदाहरण: यदि कोई अभियुक्त अपने मित्र से कहे, "हाँ, मैंने पैसे चुराए," और वह मित्र अदालत में इसकी गवाही दे, तो यह प्रमाण के रूप में स्वीकार्य होगा।
(iii) सरकारी अभिलेख और आधिकारिक दस्तावेज़ (Public Records & Official Documents)
सरकारी दस्तावेज़ जैसे कि जन्म प्रमाणपत्र, मृत्यु प्रमाणपत्र, और पुलिस रिपोर्ट को अदालत में प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- उदाहरण: यदि कोई दुर्घटना पुलिस रिपोर्ट में दर्ज है, तो इसे प्रमाण के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
(iv) व्यावसायिक अभिलेख (Business Records & Entries in the Course of Business)
जो दस्तावेज़ व्यवसायों द्वारा नियमित रूप से रखे जाते हैं (जैसे बैंक स्टेटमेंट, अस्पताल रिकॉर्ड, आदि), उन्हें न्यायालय विश्वसनीय मानता है।
- उदाहरण: अस्पताल द्वारा बनाए गए किसी मरीज के उपचार संबंधी रिकॉर्ड को अदालत में साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
(v) प्रतिपक्षी के बयान (Admissions by a Party Opponent)
यदि किसी मुकदमे में कोई पक्षकार (party) खुद अपने विरुद्ध कोई बयान देता है, तो वह साक्ष्य के रूप में मान्य हो सकता है।
- उदाहरण: यदि किसी अभियुक्त ने पुलिस को बताया, "हाँ, मैं अपराध स्थल पर था," तो यह बयान अदालत में स्वीकार्य होगा।
(vi) तत्काल प्रतिक्रिया वाले बयान (Res Gestae - Spontaneous Statements)
वे बयान जो किसी घटना के तुरंत बाद स्वाभाविक रूप से दिए गए हों, बिना किसी योजना के, अदालत में मान्य होते हैं।
- उदाहरण: यदि किसी सड़क दुर्घटना के तुरंत बाद कोई चिल्लाए, "उस ट्रक ने रेड लाइट तोड़ दी और मुझे टक्कर मार दी!" तो यह बयान स्वीकार किया जा सकता है।
(vii) पूर्ववर्ती साक्ष्य (Former Testimony)
यदि कोई गवाह किसी पूर्व सुनवाई में गवाही दे चुका है, और अब अनुपलब्ध है (मृत्यु, बीमारी, या लापता होने के कारण), तो उसकी पुरानी गवाही मान्य हो सकती है।
- उदाहरण: यदि किसी गवाह की मृत्यु हो गई है, लेकिन उसने पिछले मुकदमे में गवाही दी थी, तो उसकी गवाही अदालत में प्रस्तुत की जा सकती है।
4. निष्कर्ष (Conclusion)
यह सिद्धांत कि "सुनी-सुनाई बात कोई प्रमाण नहीं होती" न्यायिक प्रणाली का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह सुनिश्चित करता है कि केवल विश्वसनीय और सत्यापित साक्ष्य ही अदालत में प्रस्तुत किए जाएँ। हालाँकि, न्याय और तर्कसंगतता को बनाए रखने के लिए कुछ अपवादों की अनुमति दी गई है।
इस प्रकार, यद्यपि सुनी-सुनाई बातें सामान्यतः अस्वीकार्य होती हैं, लेकिन न्यायालय उन्हें स्वीकार कर सकता है जब वे आवश्यक और विश्वसनीय हों।
Reviewed by Dr. Ashish Shrivastava
on
March 12, 2025
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